गजेन्द्र मोक्ष | Gajendra Moksh
श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कन्ध में गजेन्द्र मोक्ष की कथा है । द्वितीय अध्याय में ग्राह के साथ गजेन्द्र के युद्ध का वर्णन है, तृतीय अध्याय में गजेन्द्रकृत भगवान के स्तवन और गजेन्द्र मोक्ष का प्रसंग है और चतुर्थ अध्याय में गज ग्राह के पूर्व जन्म का इतिहास है । श्रीमद्भागवत में गजेन्द्र मोक्ष आख्यान के पाठ का माहात्म्य बतलाते हुए इसको स्वर्ग तथा यशदायक, कलियुग के समस्त पापों का नाशक, दुःस्वप्न नाशक और श्रेयसाधक कहा गया है। तृतीय अध्याय का स्तवन बहुत ही उपादेय है । इसकी भाषा और भाव सिद्धांत के प्रतिपादक और बहुत ही मनोहर हैं ।
(सामग्री – गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित गजेन्द्र मोक्ष पुस्तिका से साभार)

4 comments
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मार्च 9, 2007 at 8:23 अपराह्न
Jagdish
very nice, thank you for sharing such a wonderful prasang
Best Wishes
jagdish
जुलाई 19, 2007 at 2:13 पूर्वाह्न
piyush
Sadenya Jai Shree Krishna Aap jese bhagvadiyan ki aise shram so sab vaishnav jo ki videsh he ve atyant labhanvit hove he.
अगस्त 31, 2007 at 10:45 पूर्वाह्न
deepakgohel
श्री वल्लभ को कल्पद्रुम, छाय रह्यो जग मांहि।
पुरुषोत्तम फल देत हैं, नेक जो बैठों छांह…………….
मार्च 27, 2008 at 8:04 पूर्वाह्न
RAJEEV SHARMA
GREAT IF SOME ONE THINKS OF THE FULL STORY AFTER 3 IN THE MORNING AT THE TIM OF DEATH WILL GET PURE KNOWLADGE SO PLEASE GIV THE FULL STORY IF POSSIBLE.